नई दिल्ली :  एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर उपेक्षित विषय, ‘ लघु पत्रिकाओं का यथार्थ’ पर हिंदुस्तानी प्रचार सभा एवं व्यंग्य यात्रा के संयुक्त प्रयास तथा हिंदी भवन के महत्वपूर्ण सहयोग से कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि डाॅ0 विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा - मेरी तो कर्मभूमि यही है। लघु पत्रिकाओं की भूमि संघर्ष और मिशन की होती है। मेरा मानना है कि लेखक को जितना संभव हो स्वयं को चरितार्थ करना चाहिए। लघु पत्रिका अव्यवसायिक ही होती है और जो अव्यावसायिक है उससे कमाई का कैसे सोच सकते हैं।यह एक कठिन और जोखिम भरा काम है जिसे मैंने विनम्र भाव से किया है। 

 अध्यक्षीय भाषण में डाॅ0 महीप सिंह ने कहा - लघु पत्रिका कभी भी बंद हो सकती है और इसके बंद होने का अफसोस नहीं करना चाहिए। पत्रिका में रचनाओं का चुनाव करते समय मेरे सामने यह प्रश्न कभी नहीं रहा कि रचनाकार दक्षिणपंथी है या वामपंथी, हमारे लिए रचनाकार नही रचना महत्वपूर्ण रही। ऐसी रचना जो मानवीय सरोकारों और सबंधों से जुड़ी हो। जनविरोधी, मानव विरोधी रचनाओं को कभी स्थान नहीं दिया। 

 संचालन करते हुए अपने आंरभिक वक्तव्य में प्रेम जनमेजय ने कहा - लघु पत्रिकाएं एक जिद्द का परिणाम होती हैं।यह एकतरफा प्रेम जैसा भी होता है।ऐसी अधिकांश पत्रिकाओं के संपादक/ प्रकाशक लेखक ही होते हैं और पत्रिका चलावन प्रक्रिया में उनका लेखन बैक सीट पर चला जाता है। पत्रिका निकालने एवं साधन जुटाने की प्रक्रिया में वह अपनी पत्नी बच्चों और मित्रों के श्रम का शोषण करता है। काम करवाता है पर पैसे नहीं देता। लेखकों से लिखवाता है और पारिश्रमिक देने के स्थान पर उनसे सदस्यता वसूल करता है। 

आंरभ में हिंदुस्तानी प्रचार सभा श्री संजीव निगम श्री फिरोज पैच का स्वागत भाषण पढ़ा जिसमें उन्होंने सबका स्वागत करते हुए अपेक्षा की कि इस विषय पर एक सार्थक बहस होगी । संजीव निगम ने कहा - मुम्बई से बाहर यह हमारा पहला कार्यक्रम है। मेरे विचार से लघु पत्रिकाओं की मार्केटिंग आवश्यक है। हमें चार पी - प्रोडेक्ट, प्राईस, प्रोडेक्शन एवं प्रेसेंटेशन पर ध्यान देना होगा। क्यों न हम चार-पांच पत्रिकाओं का समूह एक दूसरे का प्रचार-प्रसार करें, विज्ञापन सांझा करें। डाॅ0 रमेश उपाध्याय ने कहा - लघु एक सापेक्ष शब्द है। रहीम का दोहा है कि जहां काम आवे सूई का करे तलवार। सूई का काम सूई करेगी और तलवार का काम तलवार। लघु पत्रिका एक अव्यवसायिक कर्म है और इसपर व्यवसायिक चीजें लागू नहीं होती। इसके लिए अलग तरह के मापदंड लागू होते हैं। इसके लिए एक आंदोलन की आवश्यक्ता है। संगठन से आंदोलन नही चलते, आंदोलन से संगठन चलते हैं। 

 बलराम ने कहा - आजकल रचनाएं छपती रहती हैं पर उनपर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती हैं। पाठकों की सहभागिता पत्रिकाओं में कम रह गई है। उन्होंने ‘पहल’ के प्रकाशन का स्वागत किया और कहा कि इसके बंद होने से एक सन्नाटा छा गया था। सुशील सिद्धार्थ ने कहा - मेरे पास अनेक पत्रिकाओं के अनुभव हैं। लघु पत्रिका का सबसे बड़ा यथार्थ यह है कि आप जितने दोस्त बनाते हो उससे कहीं अधिक दुश्मन बनाते हो। इसका यथार्थ यह है कि आप घर फूंक तमाशा देखते हो। और इसका यथार्थ यह भी है कि आपकी आधी लेखन शक्ति का क्षय होता है।यह एक बहुत ही कठिन कार्य है जिसके लिए बहुत बड़ा जिगरा चाहिए। राधेश्याम तिवारी ने कहा - लघु पत्रिकाओं का सबसे बड़ा संकट अर्थिक है। सरकारें अपने प्रचार के लिए असीम धनराशि खर्च करती हैं परंतु संकट से जूझ रही पत्रिकाओं को कोई मदद नहीं करती हैं। 

रामकुमार कृषक ने अपने लघु पत्रिका निकालने संबंधी अनुभवों की विस्तार से चर्चा की। उनका कहना था कि बिना संगठित हुए हम लड़ाई नहीं लड़ सकते। उन्होंने सूचित किया कि वर्तमान दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने निर्णय लिया है कि वह किसी भी लघु पत्रिका को कोई विज्ञापन नहीं देगी। डाॅ0 सुशीला गुप्ता ने सूचित किया कि हिंदुस्तानी प्रचार सभा अपने सीमित साधनों में बहुत सार्थक कार्य कर रही है। 

हिंदुस्तानी प्रचार सभा की पत्रिका हिंदी उर्दू एवं ब्रेल में प्रकाशित होती है। उन्होंने दुख प्रकट किया कि कुछ पत्रिकाएं आपका समाचार प्रकाशित करने के लिए आपसे धन मांगती हैं। कार्यक्रम के आंरभ में प्रसिद्ध व्यंग्यकार यज्ञ शर्मा के अकस्मात निधन पर उनकी स्मृति को प्रणाम किया गया, उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

 इस अवसर पर प्रदीप पंत, प्रताप सहगल, सुरेश ऋतुपर्ण, वीरेंद्र सक्सेना, अतुल प्रभाकर, सत्यकेतू,संज्ञा उपाध्याय, बेनी प्रकाश, अविनाश वाचस्पति, संतोष त्रिवेदी, सत्यपाल सुष्म, रमेश तिवारी, अकबर महफूज आदि समेत राजधानी के सत्तर से अधिक रचनाकार संपादक उपस्थित थे। 

प्रस्तुति: प्रेम जनमेजय

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